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Thursday, February 28, 2019

Motivational short story in hindi ''आखिरी रात''

Motivational short story in hindi ''आखिरी रात''




आखिरी रात
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     बाबू मनोहर लाल की नींद रात में अचानक
खुल गई,मन में एक बेचैनी का सा अहसास था
और माथे पर पसीने की बूंदे चुहचहा आई थीं,
अपनी पत्नी की मौत के तीन साल बाद बाबू
जी अपने घर की दूसरी मंजिल के सड़क की
तरफ खुलने वाले कमरे में रहने लगे थे,कमरे
केआगे एक हवादार चौड़ी बाल्कनी थी जिसमें 
चाहें तो एक आरामकुर्सी बिछा कर नीचे की
चहलपहल का मजा लें चाहे यार दोस्तों के 
साथ गोष्ठी जमाएं पर अफसोस छियत्तर साल
की उम्र तक उनका कोई सच्चा दोस्त ही नहीं
बना था,सब मतलबी और जलकुक्कड़।

Motivational short story in hindi ''आखिरी रात''

Motivational short story in hindi ''आखिरी रात''


      बाबू मनोहर लाल ने अपना सारा जीवन
एक पक्के हिसाब किताब से जिया था,कभी
पैर ऊपर नहीं किए,हमेशा जमीन से लगे रहे,
अपना पता कभी किसी को नहीं दिया,रिश्वत
का पैसा हमेशा एक अलग चोर एकाउन्ट में
जमा किया जिसमें आज लाखों जमा है,सदा
दूसरों के सामने अपनी स्थिति एकदम निरीह
करके बताई,नया तीन मंजिला मकान भी 
बनाया तो अपने ही नाम पर रखा,हमेशा अपने
स्वास्थ्य का ख्याल रखा ,सही वक्त पर दवाई
सही वक्त पर खाना,किसी को पैसा उधार नहीं
दिया,घर और आफिस को हमेशा अलग रखा,
सदा धर्म पुण्य समाज और सरकार की बातों
पर जुबानी जमा खर्च किया और छोटी छोटी
बातों जैसे बच्चों की जरूरतें,पत्नी से अधिक
लाड़ प्यार ,चाट खोमचा ,मंहगे कपडे शपडे़
मेले ठेलों से परहेज रखा, की भी तो सदा काम काज रोजगार और बचत की बातें।
       फिर आज ये बेचैनी,अजीब सी घबराहट
क्यों,ठीक है पंद्रह दिन पहले ही दो स्टन्ट ड़ले
हैं पर बहुत अच्छे से इलाज हुआ था उनका,
सबसे मंहगे प्राइवेट हास्पिटल में दोनो बेटे बहुएं
तैनात थी इस मुश्किल घड़ी में,पर बाबू जी को
लगा था कि उनकी उस हल्के दिल के दौरे में
मौत भी हो जाती तो क्या हो जाता,पैसा पास
था तो इलाज हो गया वरना उन्हें हर बात में
हर प्रयास में एक निरी औपचारिकता ही दिखी,
जैसे वो भी एक काम था एक ड्यूटी थी बस
जिसको निभा दिया गया।आनंदी होती तो
शायद किसी एक चेहरे पे कम से कम दर्द का
अहसास दिखता।पर अब जैसे उनकीतकलीफ
भी एक निरा काम ही था।
    पर अपनी पत्नी आनंदी को भी कहां बख्शा
उन्होंने,मन तो उसका कभी समझा नहीं और
तन को उस के कभी छोड़ा नहीं,उसके रहते
एक गिलास पानी भी नहीं भरा खुद,हमेशा
उसको बेवकूफ समझा,भला हमेशा  घर की 
चारदीवारी में कैद एक अनपढ़ औरत को इस
खुदगर्ज दुनियां की ऊंच नीच क्या मालूम ,
बस हमेशा किसी न किसी खर्च की बातें किया करती थी,उस बेटी के लिए ये कर दो,फलां को 
ये दे दो,पत्नी ने भी जब अपने पति के छोटे 
मन को समझ लिया तो हार थक कर पति को छोड़ परमेश्वर को अपना लिया,ये लोक नहीं 
तो परलोक ही सुधरे।
            ले दे के, एक सच्चा दोस्त मिला था,
नौकरी के शुरूआती दिनों में रमेश बाबू, हर 
दफह उन्हीं के पाले में खड़ा रहता था,कई बार उनके लिए अफसर से भी लड़ गया,हमेशा समझाया करता था,"मनोहर,पैसा ही सब कुछ 
नहीं है,कुछ आदमियों को भी जोड़ लो अपने साथ,वरना बाद में सब बाट ही देखेगें तेरे मरने की,एक तरफ कोने में उठा रखेंगे घर वाले,
तरसोगे किसी के सामने हंसने रोने को...।" पर उनको वो नादान गैर दुनियादार ही लगता था, काश वो ही रहता साथ पर उसकी लड़की की शादी में उन्होंने खुद ही कन्नी काट ली, कहीं 
कोई बड़ी रकम न मांग बैठे...बाद में शान से 
दौ सो इक्यावन का कन्यादान दे आये उसे भी हर...जगह गाया...अचानक बाबू जी को याद आया कोई कह रहा था रमेश बाबू ने भी नया 
घर बनवाया है....ठीक है कल चलेगें फिर से ...
जोडेगें नया सूत्र....न हो तो माफी वाफी मांग 
लेगें सोचते ही कुछ दिल को कुछ राहत मिली,
पर फिर सीने में चुभने लगा जैसे एक अंधेरा 
सा छाने लगा...वो फिर कुछ और सोचना 
चाहते थे...पर दिमाग जैसे एक ही जगह रूक गया...आवाज देने की कोशिश की पर आवाज हलक में ही अटक गई...अंधेरा है कि बढ़ता ही जा रहा था..और उन्हें  शायद अब किसी दूसरी दुनिया में नयी रौशनी की तलाश थी।

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